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नामवर सिंह के उद्धरण

जब रचना में सार्थक और साकांक्ष शब्दों का प्रयोग है; तो कुछ-न-कुछ अर्थ होगा ही और अर्थ के साथ किसी-न-किसी विचार या भाव का अनुबन्ध स्वाभाविक है, लेकिन रूपवादी रचना में विचार या भाव की अन्तरिक समृद्धि नहीं मिलती।