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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

इस जगत् को महत्व देने में ही भक्ति और लोकोन्मुखता का बीज है। जो है, दिखलाई पड़ रहा है—वह मिथ्या नहीं, सच है। यह लोक और लौकिक यतार्थ की विश्वबोधात्मक या विचारधारात्मक स्वीकृति है।

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