हम यह नहीं मान सकते कि मनुष्य को आज़ादी की सोच से पूरी तरह दूर किया जा सकता है। यहाँ तक कि मनोरोगियों व पागलों के मामले में भी कहीं आज़ादी का अंश पाया जाता है, भले ही वह कितनी भी सीमित ही क्यों न हो। दरअसल रोगी के व्यक्तित्व के आंतरिक अंश को तो पागलपन छू तक नहीं पाता।
अनुवाद :
रचना भोला 'यामिनी'