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हरिशंकर परसाई के उद्धरण

हमारी प्रकृति ही है कि हम पुनरुत्थानवादी दृष्टि से सोचते हैं और आधुनिक वास्तविकता का सामना न करके, उसके बगल से निकल जाते हैं।