हमारे समाज का निर्माण ही इस प्रकार हुआ है, उसकी व्यवस्था ही इसी प्रकार हुई कि वह स्त्री से न किसी भूल की आशा रखता है, और न उन भूलों की क्षमता में विश्वास करता है। पहले से ही वह स्त्री को पूर्णतम मनुष्य मान लेता है और जहाँ कहीं अपने इस विश्वास में संदेह का लेशमात्र भी देख पाता है, वहाँ स्त्री को मनुष्य कहलाने का भी अधिकार देना स्वीकार नहीं करता।