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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

हमारे अंदर जो वास्तविक मनुष्य है, वह जन्म से मृत्यु तक अधिकांश समय सुप्तावस्था में ही व्यतीत करता है और उसके बदले काम करता है—एक नियमबद्ध यंत्र।

अनुवाद : विश्वनाथ नरवणे