Font by Mehr Nastaliq Web

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

गृहधर्म या कुलधर्म से समाजधर्म श्रेष्ठ है, समाजधर्म से लोकधर्म, लोकधर्म से विश्वधर्म—जिसमें धर्म अपने शुद्ध और पूर्ण स्वरूप में दिखाई पड़ता है।