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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

गोस्वामीजी का समाज का आदर्श वही है, जिसका निरूपण वेद, पुराण, स्मृति आदि में है—अर्थात् वर्णाश्रम की पूर्ण प्रतिष्ठा।