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दुर्गा भागवत के उद्धरण

दु:ख को निगलना परम तपस्या है। सभी कलाएँ, दर्शन, सौंदर्य का साक्षात्कार इसी दुख को निगलने की शक्ति में निहित है।

अनुवाद : वासंतिका पुणतांबेकर

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