श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण
ध्यान का अर्थ ही है, किसी एक की चिंता में लगे रहना। और, उसे ही हम बोध कर सकते हैं—जो कि हमारे लगे रहने में विक्षेप ले आता है, किंतु भंग नहीं कर सकता है।
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