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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

धर्म का अर्थ ही सामंजस्य है। यह सामंजस्य सौंदर्य की भी रक्षा करता है; मंगल की भी रक्षा करता है, एवं सौंदर्य और मंगल का भेद समाप्त कर, दोनों को ही एक आनंदमय संपूर्णता प्रदान करता है।

अनुवाद : चंद्रकिरण राठी