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महादेवी वर्मा के उद्धरण

धर्म जब मनुष्य के भावना-द्वार से हृदय तक पहुँचता है; तब उसके प्रभाव से मनुष्य की विचारधारा वैसे ही विकसित हो उठती है, जैसे मलय-समीर से कली। परंतु वही धर्म जब मनुष्य की बुद्धि पर बलात् डाल दिया जाता है, तब वह अपने भार से मनुष्य की कोमल भावनाओं को कुचल-कुचल कर, निर्जीव और रसहीन बनाए बिना नहीं रहता।