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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

ऐक्य के अभाव से मनुष्य बर्बर हो जाता है; ऐक्य की शिथिलता से मनुष्यत्व व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि सहकारिता ही मनुष्य का सत्य धर्म है, उसकी श्रेष्ठता का आधार है।