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निर्मल वर्मा के उद्धरण

आदमी उसी चीज़ का स्वप्न देखता है; जो कभी पहले थी, जो आज भी कहीं छिपी है। हम उसकी दी हुई मौजूदगी को एक गुज़री हुई याद की तरह महसूस करते हैं—नॉस्टेल्जिया की तरह नहीं, बल्कि एक छिपे हुए ज़ख़्म की तरह।