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लाओत्से

6th century BC - 5th century BC | क्यूरेन विलेज

लाओत्से की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 16

जो पंजे के बल पर खड़ा होना चाहता है, वह ठीक से खड़ा नहीं हो सकता। जो अपने दोनों पैर फैला देता है, वह चल नहीं सकता। जो आत्म प्रंशसा करता है, वह यश प्राप्त नहीं कर सकता। अहंकारी मनुष्य में गुण नहीं रह सकते। जो अपने को सबसे ऊपर मानता है, वह ऊपर नहीं उठ पाता।

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जो विनम्र होता है, वह अपने को पूर्ण रूप से सुरक्षित रख सकता है। जो झुकना जानता है, वही तनकर खड़ा हो सकता है। जो सब कुछ त्याग कर सकता है, वह पूर्णकाम होता है। जो जर्जर हो जाता है, वह नव जीवन प्राप्त करता है। जो थोड़े में संतुष्ट रहता है, वह सफल हो जाता है। जो बहुत संचय करने का प्रयत्न करता है, वह पथभ्रष्ट हो जाता है।

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बुराई के प्रति भलाई का व्यवहार करो।

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यदि सरकार सहिष्णु होती है, तो जनता बुरे मार्गों से दूर रहती है। यदि सरकार की तरफ़ से अनावश्यक हस्तक्षेप होता है, तो लोग शासन को नियमों का उलंघन करने लगते हैं।

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वासनाओं के वशीभूत होने से बढ़कर कोई पाप नहीं है, अपनी परिस्थिति से असंतुष्ट रहने से बढ़कर कोई विपत्ति नहीं है और परिग्रह के बढ़कर कोई दोष नहीं है। इसलिए संतोष की ही अंतिम रूप से सार्थकता सिद्ध होती है।

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