लगी मोहि राम खुमारी हो

मीरा

लगी मोहि राम खुमारी हो

मीरा

और अधिकमीरा

    लगी मोहि राम खुमारी हो।

    रमझम बरसै मेहंड़ा भीजै तन सारी हो॥

    चहूँदिस चमकै दामणी गरजै घन भारी हो।

    सत गुरु भेद बताइया खोली भरम किवारी हो॥

    सब घट दीसै आतमा सबही सूँ न्यारी हो।

    दीपग जोऊँ ग्यान का चढूँ अगम अटारी हो।

    मीरा दासी राम की इमरत बलिहारी हो॥

    मैं राम-नाम के नशे में चूर हूँ। रिमझिम पानी बरसता है और मेरी देह और साड़ी इसमें भीग गई है। चारों ओर बिजली चमकती है और ज़ोर से बादल गरजते हैं। सतगुरु ने भ्रम के तमाम दरवाज़ों को खोलकर रहस्य की बात बता दी। आत्मा हर देह में दिखाई देती है फिर भी सबसे विलग रहती है। मैं ज्ञान का दिव्य प्रकाश देखकर अगम की अटारी पर चढ़ जाती हूँ। मीरा कहती है कि राम के अमृत की बलिहारी है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मीरा वाणी (पृष्ठ 113)
    • रचनाकार : मीरा
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 2004

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