Font by Mehr Nastaliq Web

पद-24

pad 24

विद्यापति

और अधिकविद्यापति

    बदन चाँद तोर नयन चकोर मोर

    रूप अमिय—रस पीवे।

    अधर मधुर फुल पिया मधुकर तुल

    बिनु मधु कत खन जीवे॥

    मानिन मन तोर गढ़ल पसाने।

    कके रभसे हसि किछु उतरि देसि

    सुखे जाओ निसि अवसाने॥

    परनुखे सुनसि निअ मने गुनसि

    बुझसि लडलरी बानी।

    अपन अपन काज कहइत अधिक लाज

    अरथित आदर हानी।

    कवि भन विद्यापति अरेरे सुनु जुवति

    नहे नूतन भेल माने।

    लखिमा देह पति सिवसिंघ नरपति

    रूपनरायण जाने॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : विद्यापति (पृष्ठ 253)
    • संपादक : शिवप्रसाद सिंह
    • रचनाकार : विद्यापति
    • प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
    • संस्करण : 1992

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY