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रूठी गै भगवान भइया

ruthi gaay bhagwan bhaiya

विकास आर्य स्वप्न

विकास आर्य स्वप्न

रूठी गै भगवान भइया

विकास आर्य स्वप्न

और अधिकविकास आर्य स्वप्न

    रूठी गै भगवान भइया का हुईही,

    डूबी गै सब धान भइया का हुईही,

    क़र्ज़ा लैके बीज ख़रीदे,

    जाने कितनो मन कौ मारो।

    जाने कित्ती दवा लगाई

    जाने कित्तो डीजल बारो।

    बिखरि गए अरमान भइया का हुईही।

    डूबी गै सब धान भइया का हुईही,

    जब आसा थी तब ना बरसो,

    अब बरसों की गई कमाई।

    सोचत मन में अब का हुइहै,

    अपनी खेती हुई पराई।

    कुछत कहौ परधान भइया का हुईही।

    डूबी गै सब धान भइया का हुईही,

    बिटिया को है ब्याह किनारे,

    कितनो ख़र्चा कितनो रोनो।

    चाँदी की तो छोड़ो बातैं,

    गिरवी परि गौ सारो सोनो।

    बिक जहही का मकान भईया का हुईही।

    डूबी गै सब धान भइया का हुईही,

    अब तक मूल जुटाए पाओ,

    और ब्याज को पता नाए कुछ।

    सोचत सोचत दुःख है दीदा

    भूख प्यास को पता नाए कुछ।

    झूलि गौ रे किसान भइया का हुईही

    डूबी गै सब धान भइया का हुईही।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विकास आर्य स्वप्न
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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