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मज़हब-मज़हब करते-करते

mazhab-mazhab karte-karte

विकास आर्य स्वप्न

विकास आर्य स्वप्न

मज़हब-मज़हब करते-करते

विकास आर्य स्वप्न

और अधिकविकास आर्य स्वप्न

    मज़हब-मज़हब करते-करते कितनी दूर चले आए हम,

    इस मज़हब के चक्कर में ईमान पीछे छूट गया

    हिंदुस्तान पीछे छूट गया।

    अब रहमान राम के पीछे,

    और किशन उस्मान के पीछे,

    गुरविंदर जोसेफ़ का दुश्मन,

    हर इंसा इंसान के पीछे,

    बचकर बचकर करते करते कितनी दूर चले आए हम,

    इस बचकर के चक्कर में सम्मान पीछे छूट गया

    हिंदुतान पीछे छूट गया।

    मतलब से मंदिर के द्वारे,

    मतलब से मस्जिद में सारे,

    मतलब से ही अब भक्ति है,

    मतलब से जाते गुरुद्वारे।

    मतलब-मतलब करते करते कितनी दूर चले आए हम,

    इस मतलब के चक्कर में भगवान पीछे छूट गया।

    हिंदुतान पीछे छूट गया।

    पत्थर से बत्तर होते नर,

    सबके भीतर है कोई डर।

    पत्थर से अपनों के हाथों,

    फूट रहे अपनों के ही सर।

    पत्थर-पत्थर करते करते कितनी दूर चले आए हम,

    इस पत्थर के चक्कर में इंसान पीछे छूट गया।

    हिंदुस्तान पीछे छूट गया।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विकास आर्य स्वप्न
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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