बिस्वा किये सिंगार है

पलटू

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    बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बज़ार॥

    बैठी बीच बज़ार नज़ारा सब से मारै।

    बातें मीठी करै सभन की गाँठि निहारै॥

    चोवा चंदन लाइ पहिरि के मलमल खासा।

    पंचभतारी भई करै औरन की आसा॥

    लेइ खसम को नाँव खसम से परिचै नाहीं।

    बेचि बड़न को नाँव सभन को ठगि-ठगि खाही॥

    पलटू तेकर बात है जेकरे एक भतार।

    बिस्वा किये सिंगार है बैठी बीच बज़ार॥

    वेश्या शृंगार करके बीच बाज़ार में बैठती है और पुरुषों को मोहित करने के लिए सब पर नज़ारा मारती है। वह सभी पुरुषों से मीठी-मीठी बातें करती है, किंतु वह सबकी गांठ के रुपये-पैसे पर ध्यान रखती है। चोवा-चंदन का लेपन कर तथा खासा मलमल एवं कीमती वस्त्र पहनकर सबको लुभाती है और पंचों को—सबको अपना भरतार बनाती है। इसके आगे भी वह अन्य-अन्य पुरुषों की आशा करती है। इसी प्रकार पाखंडी लोग पति परमात्मा का नाम तो लेते हैं, परंतु उन्हें असली पति आत्मा से परिचय नहीं है। ऐसे लोग बड़े प्रसिद्ध पुरुषों के नाम लेकर उनके भक्त बनते हैं और लोगों को अपने जाल में फंसाकर उनको ठग-ठग कर भोग-विलास करते हैं। पलटू साहेब कहते हैं कि उनकी प्रतिष्ठा होती है जिसका प्रियतम निज स्वरूप आत्मा है। वेश्या के समान नाना देवी-देवताओं में उलझे हुए लोगों का महत्व नहीं है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पलटू साहेब की बानी (पृष्ठ 35)
    • संपादक : अभिलाषा दास
    • रचनाकार : पलटू
    • प्रकाशन : कबीर आश्रम, कबीर नगर, इलाहाबाद
    • संस्करण : 2012

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