दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम

सेनापति

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    दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम

    घटा की भमक अति घोर घनघोर तैं।

    कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित,

    सीकर ते सीतल, समीर की झकोर तैं।।

    सेनापति आवन कह्यौ है मनभावन, सु

    लाग्यौ तरसावन बिरह-जुर जोर तैं।

    आयौ सखी सावन, मदन सरसावन,

    लग्यौ है बरसावन सलिल चहूँ ओर तैं।।

    विरहणी नायिका अपनी सखी से कहती है कि सखी! श्रावण का महीना गया है। इस महीने में बिजली चमकती है और इंद्रधनुष भी दिखाई देता है। काली-काली घनघोर घटाओं की झमक, उनका घिरना अत्यन्त भयानक लगता है। कोयल और मोर जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुंदर आवाज़ निकालते हैं। हवाओं के झोंके चलते हैं जिनमें पानी की बूँदों के कारण शीतलता जाती है। विरहणी कहती है कि सावन को अपना, मनभावन, और अच्छा लगने वाला बताया जाता है किंतु विरह-ज्वर से युक्त मुझे तो वह तरसाने वाला लग रहा है। वह मेरे तो विरह-ज्वर को और बढ़ाये दे रहा है। वह काम-वासना को उद्दीप्त कर रहा है और चारों ओर से पानी बरसाने लगा है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कवित्त रत्नाकर (पृष्ठ 61)
    • रचनाकार : सेनापति
    • प्रकाशन : हिंदी परिषद् प्रकाशक, प्रयाग
    • संस्करण : 1971

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