Font by Mehr Nastaliq Web

युग-वाणी

yug vani

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय!

हम रहए देब नहि आब जगत मे,

छन भरिओ, विष-कुम्भक भय!

हम छी महान, छी गुण-निधान,

उर मे चिर-जाग्रत स्वाभिमान

मुख मे ज्वालामय प्रगति-गान,

गति रोकि सकै अछि नहि कृपाण,

अछि प्रकृति स्वयं सहचरी हमर,

अन्तर्बलमय, हम अभय, अजय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय!

शेषक फुत्कृति हुड्कार हमर,

शङ्कित लखि लोचन-बङ्क अमर,

भैरव हम, काँपथि यम थर-थर,

क्रोधित लखि नाचथि शिवशङ्कर,

मुखरित घर-घर डमरुक खर स्वर,

कण-कण थिड़कै अछि चेतनमय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय!

सब सावधान, सब सावधान,

जागल किसान, जागल किसान,

रहि सकए हीन नहि महा-प्राण,

दानी कहिआ धरि लेत दान,

कए अन्न-अन्न व्याकुल, निरन्न—

रहि, करब आब नहि शक्तिक क्षय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय!

गौरवक गर्व-गढ़ ढाहि देब,

नहि क्षमा करब, प्रतिशोध लेब,

कानल छी कए-कए गरल-पान,

लखि हँसब ठठा क' नव-विधान,

लए चुटकी मे पीसब विभेद केँ,

बाचत केवल सदय-हृदय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय॥

देखत जग हमरो आन-बान,

हम घुरा लेब चिर-लुप्त मान,

त्रिभुवन मे पसरत सुयश गान,

हम परम धर्म, हम ही प्रमाण,

गरजत पद-दलितक दल, जीवित

भए, उठा हाथ जय-मंगलमय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय॥

की कए सकैत अछि लघु निर्बल,

देखत लोचन भरि स्वार्थी, खल,

ठेहुन टेकत 'तोजो', 'हिटलर'

बम-बम हर-हर, बम-बम हर-हर,

समताक शङ्ख हम फूकि देब,

छी प्रलयङ्कर, छी मृत्युञ्जय!

हम करब प्रलय, हम करब प्रलय!

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 60)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY