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युद्ध की चर्मसज्जा

yuddh ki charmsajja

नादिया इबराशि

नादिया इबराशि

युद्ध की चर्मसज्जा

नादिया इबराशि

और अधिकनादिया इबराशि

     

    काहिरा, मिस्र 1967

    मैं पिता की ऊँची होती आवाज़ से जागी
    तब तक माँ की आवाज़ भी सुनाई देने लगी थी

    हमारी शेव्रले कार को रोककर
    सैनिकों ने कार के दरवाज़े पर दस्तक दी
    हमारे काले शीशों को जाँचने की ख़ातिर
    रोशनी मंद करने को कहा

    शोर भरे दिन और रात
    सिनाई1 में मरते हुए लोग
    हमारे छोटे से श्वेत-श्याम टेलीविज़न पर
    चिल्लाता हुआ एक राष्ट्रपति

    मैं बच निकलना चाहती थी युद्ध की चीत्कार से
    तो भागकर एक पड़ोसी के घर चली गई
    वहाँ तीन पितृहीन बच्चे एक झुंड में बैठे थे
    उनकी माँ ताड़ के पेड़ की टहनी से
    बड़ी ख़ुशी से उधेड़ रही थी नौकरों की पीठ

    एक दूसरी पड़ोसन का पिता
    मेरे और उसकी अपनी बेटी के सामने
    नग्न होकर आ खड़ा हुआ
    हम भौचक्की रह गईं

    मैं बिना शल्कों वाली मछली थी
    बिना पंखों वाली पंछी
    जब मैं उड़ जाया करती थी
    प्रत्येक रात
    दूर
    हमारे घर से
    पड़ोस से
    वतन से

    कलह के थपेड़ों में
    डूब गया था
    एक पूरा इलाक़ा

    मैं खिड़की से कूद
    तैरती गई बेतहाशा
    एक मछली की तरह
    जो पक्षी में विकसित हो जाती है
    आकाश में प्रविष्ट होती है

    मुझे महफ़ूज़ रखा
    एक ख़ुफ़िया गुफा ने


                                         

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : नादिया इबराशि

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