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वो पल रुका है मेरे घर की मेज़ पर

wo pal ruka hai mere ghar ki mez par

ममता धवन

ममता धवन

वो पल रुका है मेरे घर की मेज़ पर

ममता धवन

और अधिकममता धवन

    चाय के दो कप

    और एक केतली...

    मेज पर पड़े हैं ख़ामोश

    कोई हलचल नहीं

    रुके रुके से शांत

    चुप्पी को समेटते हुए

    अपनी-अपनी जगह पर मौन को ओढ़े

    एक-दूसरे के क़रीब फिर भी

    अलग-अलग पड़े हैं

    मैं इनको देख रही हूँ

    मैं उस वक्त से इनको देख रही हूँ

    तुम्हारे वाले कप में

    जो थोड़ी चाय रह गई है

    वो कितनी वो बातें हैं

    जो हम दोनों के बीच हो सकतीं थीं।

    मेरी वाली चाय

    जिसका प्याला भरा है अब तक

    प्रेम की कितनी ही कहानियाँ लिख सकती थी

    तुम्हारी चाय मेरी चाय

    यदि कप अदल-बदल कर लेते

    तो कितना ही कुछ अदल-बदल हो जाता

    और उस अदला बदली में

    तुम मेरे हो जाते...

    मैं तुम्हारी॥

    हमारी दास्ताँ बनती

    और ये चाय के कप उसके गवाह होते

    ये बन जाते हमारे प्रेम का प्रतीक

    और मैं इन्हें सजा देती

    अपने ड्राइंग रूम की अलमीरा में

    संजो लेती उस अलमीरा में

    प्रेम के स्रोत का ये पल

    ताकि घर आने वाले हर मेहमान को

    मैं इन चाय के प्यालों का इतिहास सुना सकती

    और हर बार महसूस करती इस

    पहली सिहरन को

    जो एक साथ तुम्हें और मुझे

    एक-दूसरे के लिए हुई

    किंतु मैं देख रही हूँ

    इन चाय के प्यालों को

    उस वक्त से...

    जिस वक्त से तुम

    आधा कप चाय का छोड़

    मेरा पूरा मन अपने साथ ले गए थे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ममता धवन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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