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विश्वग्राम दिस

vishvagram dis

राज

राज

विश्वग्राम दिस

राज

और अधिकराज

    एगो समय रहै

    जखन देरीसँ

    घुमला पर घर

    पूछैत छलि माए

    दिन भरि बहबैन रहलें

    की खेलें?

    आब घुमला पर चढ़ल राति

    पूछै छथि पत्नी

    मटरगस्तिये भेलै कि किछु एलै?

    बाजै ने माए।

    चुप्प किये भ' गेलें?

    की सरिपों हमर गाम पसरल-ऐ

    आकि फेर कपड़ासँ बेसी

    हमर गोर पसरल-ऐ

    कटोरीवाला, कुरथी काढ़ा

    पेप्सीकट, पलास्टी गिलासमे

    ऐंठ-जुठि कए पीअब

    नव कपड़ा फाड़ क'

    चीप्पी सन सीअब

    जीबैत सूरैतमे, मुर्दा सन जीअब

    कहै नै, सब कियै?

    आखरिस ककरा लेल

    आँखि बिसबास नै द' पबै-ऐ

    कि आखरिस की बदलल-ऐ

    देसी धरतीपर सजाओल

    परदेशी गमला-ऐ

    जंगल दिस खुगैत

    जंगला-ऐ

    हँ, यार लैह

    आब तँ तैआर

    अपन भूत-बंगला-ऐ

    मूल रूपसँ संस्कृति पर

    भावी हमला-ऐ

    एगो आर, चरस-अफीमक

    निसाँ मे बुत्त

    बाजार बा बाजारू बनल

    बेचारा अपन मंगला-ऐ

    सरिपों,

    गालिबक तर्जमे सरग बनेबामे

    विफल व्यवस्था नरक कें

    आर नमहर करबाक विज्ञापन

    करबा देलक-ऐ

    उपनिवेश केँ नव नाम

    स्वांग धरबा देलकए

    नदी केँ आपसमे

    जोड़बाक

    कोड़बाक बदला

    भरबा देलक-ऐ

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 95)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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