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विश्व में कहीं नहीं

vishv mein kahin nahin

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

मिलीवौय स्लावीचैक

मिलीवौय स्लावीचैक

विश्व में कहीं नहीं

मिलीवौय स्लावीचैक

और अधिकमिलीवौय स्लावीचैक

    कहीं नहीं विश्व में वास्तव में कुछ गंभीर

    कुछ ख़ूनी-सा है, भयभीत, महत्त्वपूर्ण और

    कुछ बहरा है, चिर, जो आधारभूत है

    लेकिन कहीं नहीं कुछ भी गंभीर वरन् वास्तव में :

    सब थोड़ा बहुत बिखरा-सा

    है कुछ कंक्रीटी और धूलभरा कुछ

    कुछ निओनमय कुछ शांत कुछ सुदूर बड़ा

    सच है, है कुछ पीड़ित और कामुक भी

    लेकिन नहीं कुछ भी गंभीर वास्तव में और ही कुछ स्पष्ट ही

    बावजूद सारे कोलाहल के और यश के विश्व जो पाया तूने

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 146)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : मिलीवौय स्लावीचैक
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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