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विक्तोर ओत्तो मास

viktor otto maas

कुर्ट फोल्च

कुर्ट फोल्च

विक्तोर ओत्तो मास

कुर्ट फोल्च

और अधिककुर्ट फोल्च

     

    घिर आया है अँधियारा धरती पर

    आसमान पर नहीं

     

    मेरी माँ

    अपने पिता के दफ़्न की तैयारी में हैं

    चेहरा रह गया सिर्फ़ हड्डी :

    गाल चमड़ी और पके अंजीर

    का सफ़ेद गूदा

     

    (मैं नहीं 

    देखना चाहता मगर फिर भी

    देखता हूँ उसे अकड़ा हुआ

    पैरिश1 के एक कमरे में

    बिना बैज के

    अपनी सबसे उम्दा क़मीज़ में)

     

    अपने

    चार बच्चों

    (परस्पर लड़ते

    दो आदमी और दो औरतें)

    और पोतों की सहायता से

    समा जाएगा धरती में।

     

    मेरी माँ

    रोती है

    दफ़्न की रीतियों की ख़ामियों पर

    क़ब्रिस्तान की दूरी पर (कोई

    वाहन भी नहीं)

    रोती है

    भाई-बहनों की निरंतर घृणा पर

    जो क़ायम थी उस कड़ाके की

    सर्दी (ध्रुवीय लहर) में भी जिसमें

     

    मरने की ठानी विक्तोर ओत्तो मास साहब ने

    स्पष्ट कुछ भी न रहा अब

    उस सन्नाटे में,

    शहद की रोटी, रेंगती लताओं की छाया

    सुरक्षा की चादर

     

    मेरी माँ

    रह गई है केवल ठूँठ-सी

    देखा करती है धरती को

    (आसमान को नहीं)

    धरती, चारों दिशाएँ जिसकी

    विलीन हो गई हैं अँधेरे की ओट में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 99)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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