घिर आया है अँधियारा धरती पर
आसमान पर नहीं
मेरी माँ
अपने पिता के दफ़्न की तैयारी में हैं
चेहरा रह गया सिर्फ़ हड्डी :
गाल चमड़ी और पके अंजीर
का सफ़ेद गूदा
(मैं नहीं
देखना चाहता मगर फिर भी
देखता हूँ उसे अकड़ा हुआ
पैरिश1 के एक कमरे में
बिना बैज के
अपनी सबसे उम्दा क़मीज़ में)
अपने
चार बच्चों
(परस्पर लड़ते
दो आदमी और दो औरतें)
और पोतों की सहायता से
समा जाएगा धरती में।
मेरी माँ
रोती है
दफ़्न की रीतियों की ख़ामियों पर
क़ब्रिस्तान की दूरी पर (कोई
वाहन भी नहीं)
रोती है
भाई-बहनों की निरंतर घृणा पर
जो क़ायम थी उस कड़ाके की
सर्दी (ध्रुवीय लहर) में भी जिसमें
मरने की ठानी विक्तोर ओत्तो मास साहब ने
स्पष्ट कुछ भी न रहा अब
उस सन्नाटे में,
शहद की रोटी, रेंगती लताओं की छाया
सुरक्षा की चादर
मेरी माँ
रह गई है केवल ठूँठ-सी
देखा करती है धरती को
(आसमान को नहीं)
धरती, चारों दिशाएँ जिसकी
विलीन हो गई हैं अँधेरे की ओट में।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 99)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.