अछि सूखल नयन नदी हियमे मरुभूमिक घोर बिहाड़ि बहय।
मधु-कानन के सुकुमार सखा कविकोकिल, हाय, बजाउ कतय?
शिवसिंह विशाल रसाल गेला, लखिमा मधु-श्री नहि आब एतय।
विकसय विसफी मृदु-मंजर ने मधु पीबि जकर कोकिल कुहुकय॥
मिथिला-मृदु-भाषा-काननमे, अपने जे रोपल काव्य-लता
छल, टूटि पड़ल बंगीय भ्रमर, जनि देखि मनोहर मंजुलता
अछि सूखि रहलि से भूमि खसलि, आसार बिना आधार बिना।
नव कोरक हाय, फुलैत कोना? जननी तनमे रसधार बिना?
अछि आइ एतय बँसबाड़ि विकट फकस्यार, शृगाल विलाड़ालय
कहु कोकिलकेँ पुनि पोसत के? मधु-मादक-गान सुनयबा लय।
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 14)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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