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विद्रोही बसात

vidrohi basat

रामकृष्ण परार्थी

रामकृष्ण परार्थी

विद्रोही बसात

रामकृष्ण परार्थी

और अधिकरामकृष्ण परार्थी

    लोकक तीव्र विरोध प्रतिरोधक बावजूदो

    हम रोपि रहल छी क्रांतिक गाछ

    एहि गाछकेँ सींचि रहल छी

    अपना शोणित-पसेनासँ

    द' रहल छी एहिमे

    नित नव विचारक खाद

    एहि उम्मेदक संग

    जे गाछ हमर आबयबला पीढ़ीकेँ

    कहतैक हमर संघर्षक इतिहास

    जाहिसँ ओकरा सभकेँ बढ़तैक हिम्मति आर सहास

    अन्याय-अत्याचारसँ लड़बाक लेल

    सभ बुलंद करैत रहतैक अपन अवाज

    इंकिलाब-जिंदाबाद

    गाछ एक ने एक दिन बनतैक

    सामाजिक न्यायक प्रतीक

    समाजमे नहि रहतैक कियो उच्च नीच

    दलित-शोषित-वंचित वर्गमे जगेतैक

    आत्म-स्वाभिमान

    सभ नहि सहतैक अपमान

    गाछ फुलेतैक आन्दोलन

    फड़तैक इंकिलाब

    एकर छत्र-छायामे आबि मुर्दो चिकरतैक जोरसँ

    इंकिलाब-जिंदाबाद

    गाछ रोपैत काल

    हम जे-जे देखि रहल छी सपना

    जे-जे क' रहल छी कल्पना

    सभ हैत साकार

    अछि हमरा विश्वास

    एहि गाछसँ बहतैक विद्रोही बसात

    जकर प्रभावसँ लोक षड़यंत्रकारी व्यवस्था

    निठल्ला सत्ताक खिलाफ

    बुलंद करैत रहतैक अपन आवाज

    इंकिलाब-जिंदाबाद।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विद्रोही बसात (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2024

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