तुमने कहा प्रेम
मैंने सुना विद्रोह।
और फिर चल पड़ी
तुम्हारी दिखाई राह पर
करने लगी बग़ावत
समाज से, दुनिया से
सही के लिए
लड़ी ग़लत के ख़िलाफ़
और संग ही लड़ी
सही में छिपे ग़लत से भी
लड़ना पड़ा अपनों से भी
और अपने आप से भी
लड़ी मैं तुम्हारे प्रेम की ताक़त से
ऐसा लगा मैं चली हूँ अकेली
पर समय के साथ जुड़ी हर कड़ी
हिम्मत, साहस, सहयोग, दृष्टिकोण की
और सत्य के राह में मैं लड़ती रही
वही राह जो तुमने दिखाई थी
तारों के बीच के ख़ालीपन को भरते हुए
फूलों के रंगों को समझते हुए ही तो
समझे ये हम दुनिया के भी रंग
रात दिन के फ़र्क़ से निकाले थे
गुणा भाग समाज के फ़र्क़ से
तुम्हारी आँखों में ही देखा था मैंने
करुणा का सागर
जो बहता रहता है इस संसार में
हमारी आत्ममुग्धता की ज्वाला से इतर
गली गली धूम ही जाने थे न हम
बिन उद्देश्य रहने का मर्म
प्रेम ही तो सिखा रहा था
तुम्हें भी, और मुझे भी
बग़ावत की ज़रूरत।
सो तुम करते रहे प्रेम
और मैं समझती गई विद्रोह
प्रेम से ही।
तो जब हमारे लिए
तुम्हें करना था विद्रोह
तुम क्यों कर बैठे प्रेम!
- रचनाकार : अर्पिता धमीजा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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