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वसंत का पतन

vasant ka patan

फ्रांसीस्को एरनांदेस

और अधिकफ्रांसीस्को एरनांदेस

    1.

    मैंने देखा है उसे दयापूर्ण नज़रों से पिछले महीनों में।

    मैं ग्यारहवीं मंज़िल पर हूँ और यहाँ तक पहुँचता है

    खुदाई मशीनों और गाड़ियों का शोर और मरने से इनकार करते कुत्तों का

    कराहना।

    मैं ध्यान से देखता हूँ उसे टिकटिकी बाँधे, कोशिश करता उसके कुहरे के बीच

    सूरज को देखने की। इतनी सुबह, शहर एक जम्हाई लेता हाथी है।

    2.

    बदबू रही है शहर से। बसंत के आते ही नालियों में

    फूल भर गए हैं।

    धूल और ओज़ोन के बीच फूट पड़े हैं नज़ारे जौकारौंडा के,

    ख़ंजर कई रंगों के और

    एक तीखी गंध सड़े हुए संतरों की-सी।

    3.

    नीचे है पुलिस, जूता पॉलिश वाले, नर्सें, बौने, हमलावर, लपटें निकलती हैं

    आग की

    खिड़कियों से और सायरनों की चीख़े घोषणा करती हैं हिंसा के बोलबाले का।

    यहाँ दसवीं मंज़िल पे, हम चलते हैं मृत शंकाग्रस्त, पीड़ित, सावधान,

    कहीं ऐसा हो कि हमें दुबारा मार डालें।

    4.

    छतें हैं ऊँचे आँगन, बिल्लियों का घर, गमलों का आख़िरी कोना।

    पिंजरों में ज़बरन उतरा जाता है रंग चादरों, टेबल कवरों

    और क़मीज़ों का। कोई हवा नहीं

    मगर फिर भी गिर जाता है बियर का एक इश्तहार।

    एक बुढ़िया लड़ रही है ख़याली ततैयों से। एक साइकिल सवार

    याद कर रहा है वह सुबहें

    दिख जाते थे जब ज्वालामुखी, उसका ध्यान हटता है और एक वैन

    तोड़ जाती है पसलियाँ उसकी।

    5.

    पेड़ों से ज़्यादा ज्यामितिक दृश्य है एंटीनाओं का यहाँ। छोटे-छोटे बाज, एकदम

    फ़ाख़्ताओं जैसे,

    उड़ते हैं सड़कों के ऊपर से टुकड़ों या मल की खोज में।

    गैस सिलिंडर बड़ी मेहनत से अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। टंकियों

    के मुँह सूखे हैं और काँपते हुए इंतज़ार कर रहे हैं वे

    तेज़ाबी बारिश का।

    6.

    टेलीफ़ोन की घंटियाँ रुकती ही नहीं। कुछ अन्य मृत लोग हमें फ़ोन

    करते हैं दूर ऊर्ध्व क़ब्रिस्तानों से।

    बाहर, सबसे ज़्यादा दिखता है भूरा रंग। यहाँ दसवीं मंज़िल पर, किसी

    चीज़ का कोई रंग नहीं है, सिवाय मृत महिलाओं के होंठों के।

    मैं फिर उठता हूँ वसंत को निहारने।

    कूड़े से घिरे प्रेमी चूम रहे हैं एक दूसरे को और चिपके पड़े हैं चूहों के जोड़े।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 299)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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