Font by Mehr Nastaliq Web

(1)

खङ्ग, मुण्ड, वर, अभय भूषिता,

शिव-भामिनि, श्री श्यामा।

करथु 'भुवन' उपकार, सदय भए,

भक्तक पूरण-कामा॥

मत्त नयन, रसना बड़ लोहित,

मुण्डमाल गल सोभए।

मुक्त चिकुर, उपमा जकर,

से जलधरहुक मन लोभए॥

कोटि मयंकक रश्मि-राशि मुख,

विमल सुधा बरसाबए।

अशरण शरण-चरण-तल-लुंठित,

हरिक मुकुट छबि पाबए॥

भुवनेशी, अज, ईश शेष रत रहथि अहिँक पद ध्याने।

हम 'भुवनेश' चरण-मधु-मधुकर, मत्त रही गुण-गाने—॥

(2)

काली, तारा, त्रिपुर-सुन्दरी

जनिक भैरवी नाम।

से भुवनेशी दीन 'भुवन' काँ,

पुरबथु सभ मनकाम॥

सुमुखि रहथु बगला-मुखि माता,

अधमक हो संहार।

धूमावति, छिन्नाक कृपा सँ,

सत्पुरुषक उद्धार॥

मातंगी-मदशालिनि, कमला, करथु अपन दृगपात।

भक्त-समूह विजय-वर पाबथु हो, 'देश'क दुख कात॥

(3)

सुर, नर, मुनि प्रतिपालिनि अम्बा,

श्री नगराजक कन्या।

देशक कए उद्धार कहाबथु,

धन्या, धन्या, धन्या॥

दीन 'भुवन' पर भए सहाय,

रिपु-घाली माता काली।

एक बेरि वृन्दावन आबथु,

पुनि बनि श्री बनमाली॥

जनिक प्रसादेँ भक्त-समूहक, कवलित सबटा भय हो।

कवि 'भुवनेश' पदोदक पाबथि, नित प्रेमक जय-जय हो।

(4)

आशुतोष-भामिनि शिवे, सज्जन कुल केँ तारि।

निज प्रभुत्व प्रकटित करू, खल-दल केँ संहारि॥

शंकरी, सपूत-वंश उन्नति सदैव करू;

काटि क' कुपूत केँ कराल-वेष धए केँ।

पुण्यशील, शुद्ध परिवारक पसारू यश;

पातकी, प्रमादी, पामरौक प्राण लए केँ।

मंगल बिखेरि दिअ, सुरक समूह पर,

दुष्टक कपाल काली, कत्ता सँ कतरि केँ।

सुकवि-समूह काँ देखाउ दिव्यताक ज्योति,

बंचकक शोणित सँ खप्परि केँ भरि केँ।

(5)

जनिक चरण-रज पाबि;

स्वयं श्री धरणी होथि कृतार्थ,

लहि-लहि जनिक प्रसाद,

धनुर्धर अतिशय भए गेल पार्थ।

तनिक प्रसादेँ, “डूबि रहल अछि—

तरणी जे मझधार,

'भुवन'क विनय, आबि

श्रीमोहन स्वयं लगाबथि पार॥

दुख शोकक भए नाश

प्रकट हो पुनरपि श्री, सुख, शान्ति,

क्लान्त रहए नहि केओ देश मे,

हो विध्वंस अशान्ति।

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 45)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY