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उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं?

uyi kyatne baDe bahadur hayin?

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं?

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

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    धरती पर जब ते पाउँ धरिनि, सुभ करमन का संहारु किहिनि,

    उलटी-पलटी बुद्धि के सहारे, अपनयि मतु पहचारि दिहिनि

    कोई जो सूधे दिल ते ब्वाला, बड़े दिमागन झारि दिहिनि—

    उयि क्यतने बड़े बहादुर हयिं!

    जो-नंगे भूखे परे रहयँ, तिन का अउरउ नंगा किहनिनि;

    जेतनी मरजादयि झँपी रहयिं बेदरदी से उधारि लिहिनिनि,

    जबरन ते धक्का खायिनि तउ, निबरन के मुक्का जड़ दिहिनिनि,

    उयि यतनें बड़े बहादुर हयिं!

    कोई की सुन्दरि बिटिया देखिनि, तुरतयि पाछे लागि लिहिनि;

    अपनिन से कउनु बात पूँछयि, उयि जहाँ चहिनि उधारु खायिनि।

    कुतवा ब्वकरा अस घुसे छहोरिन , मारिनि अउर मारू खायिनि—

    उयि पूरे जंग बहादुर हयिं!

    हन्निन-भइँसन का मारिनि, ध्वाखा धंधी मा, मचानु गाड़िनि!

    ढुक्के-ढुक्के लुक्के लुक्के चुप्पे ते बाघु पछारि दिहिनि,

    दूरिउ ते दउरि दहारि दिहिसि तउ तंबा तकु तर कयि डारिनि;

    उयि यतने खरे बहादुर हयिं!

    तोबइ, बंबयि, जहरीली गैसयि, बड़ी-बड़ी ईजाद किहिनि,

    बदरे चढ़ि कयि पिरथी पर डारिनि , मानउँ सब कुछु संघारिनि,

    दिन-राति निहत्थे मनइन का जयिसी पायिनि तयिसी भूँजिनि;

    उयि इहिते बड़े बहादुर हयिं!

    साह्यब का हाथा—पइयाँ घ्यारउ, द्याखउ असिलि बहादुरी जब,

    खींसयि द्याखउ लुरखुरिया द्याखउ, अउर पालिसी द्याखउ अब

    उयि ह्त्या करयि बड़े सिपाही, यिहि का मउका पावयिं तब

    उयि पूरे बीर बहादुर हयिं!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 142)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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