आज भी वह साँवला तमिल, पूर्वी बंगाल का
मंगोलरूपी, कश्मीर का इंडो-आर्य
बाहर हैं आँकड़ों की पहुँच से
वे थामे हैं रबर बैंड की तरह
साझी जड़ों को
हालाँकि हमारी परियोजना (तजुर्बेकार
एक्सपर्ट, पर्याप्त रूप से आक्रामक)
के तहत
ज़ोर है जड़ों से कटे होने की
दख़लअंदाज़ी का। मुक्त
जीवंत, पारदर्शी प्रतिबिंब जैसे,
वह ज्ञानी, इसके बावजूद भी
जीवित रहता है। यहाँ हम कुछ ज़्यादा ही सरल
बना देते हैं और उस सरलीकरण से सब नज़र आते हैं एक समान
और फिर, लेबल लगाकर ख़त्म कर देते हैं हम
विशिष्टताएँ सारी। गुलाबी के अनगिनत रूपों में से
(दुनिया के सारे गुलाबों की) हम चुनते हैं बाज़ार, भुला देते हैं
'गुलाब के खिलने के तौर तरीक़े'
और यथार्थ का सारा असंभावित अर्धसत्य-उसका विज्ञान
(क्या जानते हैं हम आड़ू
और उसका सौंदर्य
के बारे में?)
आइए थोड़ा ध्यान से देखें, वहाँ पेड़ के क़रीब
नुकीला उभार लिए एक अर्धविभाजित गोलाकार,
रोयेंदार, पीला, पीछे से कुछ
हरा-सा और गाल जिसके लाल।
नहीं रखा है क़दम अभी कला की दुनिया में
पर हाँ
झाँक लेता हूँ पर्दे के पार
उनकी तरह (डच प्रथा में?
या हर लिखाई की मासूमियत की तरह?)
बनाए जिनका चित्र एक हाथ (हस्ताक्षर हैं जिस पर एउरवेनिया के)
सब कुछ मुरब्बा-सा बनने से पहले। वही तो होता है
जब खुली आँखें सौंदर्य की शुद्ध दृष्टि से हटकर पड़ती है
रोज़मर्रा के उपभोगों पर,
जो हमें अंधा बना देती है,
नष्ट कर डालता है हमें यह बदलाव।
निकृष्टीला, सुस्तीला, शिथिलीला
कहा जाता है जो अक्सर कीड़ों के अस्तित्व को
ठीक ऐसे ही दीमक की तरह चाटता
बदल देता है धीरे-धीरे
उस मज़बूत, गुप्त, अनंत विविधता लिए
ज़िंदगी का उतार चढ़ाव को भी।
किस तरह यहाँ इस वक़्त, गुलाब के
हर रूप और पल में
प्रकट हो रही है और ढँक रही है पौधे को
वह मूल गाथा।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 73)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.