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उन्हीं हाथों से

unhin hathon se

रोबेर्तो फेरनांदेस रेतामार

और अधिकरोबेर्तो फेरनांदेस रेतामार

    मुहब्बत जताई थी तुमसे जिन हाथों ने

    उन्हीं हाथों से बना रहा हूँ एक स्कूल।

    मैं पहुँचा तो सुबह हो चली थी,

    काम पर पहनने वाले कपड़ों में था मैं शायद,

    पर उन चीथड़े पहने इंतज़ार करते

    पुरुषों और लड़कों ने

    मुझे फिर भी साहब कहा।

    रहते हैं वे साथ एक घर में

    जो उजाड़-सा है

    कुछ चारपाइयाँ और डंडे हैं उनके पास : वहीं गुज़ारते हैं रातें

    अब, पुलों के नीचे या दरवाज़ों के सामने नहीं।

    उनमें से एक पढ़ना जानता है, उसे भेजा गया

    मुझे ढूँढ़ने, पता जब चला मेरे पुस्तकालय के बारे में।

    (उसका क़द लंबा है, व्यक्तित्व दमकता, रखता है दाढ़ी अपने अक्खड़ मुलातो

    चेहरे पर)

    मैं गुज़रा उधर से बनेगा जहाँ छात्रों का डाइनिंग हॉल,

    केवल चिह्नित आज, एक चप्पल से

    जिसके ऊपर मेरा दोस्त बना रहा था उँगली से

    हवा में खिड़कियाँ और दरवाज़े।

    पिछवाड़े में थे पत्थर, और लड़कों की एक टोली

    उन्हें तेज़ ट्रॉलियों में भर रही थी। मैंने भी माँगा एक

    और यूँ सीखने लगा बुनियादी लोगों के बुनियादी काम।

    फिर मिला मुझे मेरा पहला फावड़ा, और पिया मैंने

    मज़दूरों का जँगली पानी।

    और थक के चूर फिर, मैंने सोचा तुम्हारे बारे में,

    उस वक़्त के बारे में जब

    काट रही थी फ़सल तुम और धुँधला गई थीं आँखें,

    उसी तरह जैसे मेरी धुँधला गई हैं अभी

    कितने दूर थे हम यथार्थ से,

    प्रिये, कितना दूर-जैसे हैं अभी एक-दूसरे से— !

    हम योग्य थे सुख पाने के

    बातचीत और भोजन के, और पादरी की दोस्ती के।

    मुझे याद है वह प्रेमियों का जोड़ा

    शर्मा गया था जो

    जब इशारा किया हमने उनकी तरफ़ हँसते हुए

    धूम्रपान करते कॉफ़ी के बाद।

    कोई ऐसा पल नहीं

    जब याद नहीं करता तुम्हें,

    आज शायद और ज़्यादा,

    जब जुटा हूँ बनाने में यह स्कूल

    उन्हीं हाथों से, चाहा सदा जिनसे तुम्हें।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 133)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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