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उन्हें किसी नमक की ज़रुरत नहीं पड़ी

unhen kisi namak ki zarurat nahin paDi

अनामिका अनुगूँज

अनामिका अनुगूँज

उन्हें किसी नमक की ज़रुरत नहीं पड़ी

अनामिका अनुगूँज

और अधिकअनामिका अनुगूँज

    उन्हें किसी नमक की ज़रुरत नहीं पड़ी,

    समुद्र अपने ही खारेपन से रहे हमेशा त्रस्त।

    उन्हें अपने खारेपन को कम करने के लिए

    पानी चाहिए था।

    उन्होंने नदियों से की याचना

    माँगते रहे पानी।

    नदियाँ प्रेम में उमड़ पड़ीं और

    उड़ेलती रहीं समुद्र में स्वयं को।

    लेकिन समुद्र का खारापन था

    जो ख़त्म ही नहीं होता था,

    मैंने सोचा

    समुद्र इतना खारापन लाए कहाँ से?

    और नदियाँ इतना पानी?

    नदियाँ समुद्र में मिलती गईं

    और एक दिन इस प्रक्रिया का अंत हुआ

    साथ ही नदियों के प्रेम का भी।

    लेकिन तब तक

    नदियों का समस्त पानी समुद्र में मिलकर

    खारा हो चुका था

    और नदियाँ हो चुकी थीं रेत और चट्टानें

    जो फिर किसी समुद्र के प्रेम में नहीं पड़ीं

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनामिका अनुगूँज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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