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उन्दोधन

undodhan

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

और अधिककाञ्चीनाथ झा 'किरण'

    जाग रे! विदेह भूमिकेर समाज जाग रे।

    राख जनक याज्ञवल्क्यकेर पाग लाज रे॥

    बितल विदेशकेर दासता अमानिशा।

    स्वतंत्रता-उषा-प्रकाशसँ विभासिता दशोदिशा॥

    कमल जकाँ कलिंग-बंग असम फुला रहल।

    देखि कय जकर प्रभा विहार लजा रहल॥

    सुन सयान धीर वीर आन्ध्रकेर अट्टहास।

    भय स्वतंत्र कय रहल, कोना अपन मने विकास॥

    कण टको करोट फेरि ठाढ़ भेल सावधान।

    दबल, पिचैल केरलो प्रबुद्ध भय पबैछ मान॥

    घुमड़ि रहल महाराष्ट्र गुर्जरो गुम्हड़ि रहल।

    ताराक तीक्ष्ण तेजमे पंजाब सम्हरि रहल॥

    छोड़िकय घमंडकेँ स्वयं सचिन्त देहली।

    देखि, दौड़ आइ झुकबैत छैक ताज रे॥

    तोहरो थिकौक देश तहूँ स्वतंत्र भेल छेँ।

    सोच ने! टुगर जकाँ तोँ किए दबेल छेँ।

    जकर मायक रहै मान बापकेर धाममे।

    तकर कदापि हो मान घऽरमे कि गाममे॥

    मातृभूमि तीर-भुक्ति हिन्दकेर वक्षपर।

    पाबि जाय समान मान सैह एक लक्ष्य कर॥

    उठैत जो बढ़ैत जो आब नै विलम्ब कर।

    मातृभूमि-मुक्ति हेतु जंग साज साज रे॥

    सुमर अपन पूर्व पुरुष कपिल-कणाद न्यायकार।

    महावीर जनक याज्ञवल्क्य धर्मशास्त्रकार॥

    सुमर अपन शस्त्र शक्ति-रावणो निरस्त गेल।

    सुमर अपन शास्त्र शक्ति, एतय के पस्त भेल॥

    तोरे ओतय एलाह राम बिना नोत हकार।

    शुकाचार्य पढ़य एला मानि बापकेर विचार॥

    अपन धवल अतीत सभ वर्तमान भविष्य।

    बनाय सिंह-हँस जकाँ विश्वमे विराम रे॥

    हँटा मनक दैन्य भाव दूर कर भ्रम-प्रमाद।

    मस्त मने सुमरि सुमरि अयाचीक सागरे॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 65)
    • संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
    • रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
    • प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
    • संस्करण : 1989

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