रात जब अपनी चादर से सभी को ढँक लेता है
तो खुलती है दूर पहाड़ी पर दो आँखें
जो खोजती है
कल का भविष्य ओझल तारों के मध्य
मगर बंद हो जाते हैं रास्ते
जब उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता अँधेरे में
उठने की कोशिश में
टकराता है वह पत्थरों से
आँखों का चश्मा टूट जाता है
साथ ही टूटता है स्वप्न
फिर अँधेरे से लड़ने जलाता है लालटेन
उसे दिखता है
एक फुफकार मारता
काला नाग
जो तैयार है डसने उसके सपनों को
सुला देना चाहता है वह
सदा के लिए
ग़रीब और ग़रीबों के सपनों को
क्योंकि उन्हें पता है कि
अमीरों के सपने बंद होते हैं
कई सुरक्षा कवचों के बीच
तभी आती है जोड़दार आँधी और बारिश
लालटेन लड़ता है आकाशीय बिजली से
हवा के थपेड़ों से
मगर कोई उसे नहीं बुझा पाता
क्यूँकि उसने भी ओढ़ रखे हैं
ग़रीबी का सीसा अपने ऊपर
तभी गर्म सीसे पर पड़ती है ठंढी बूंदें
और चन से चनाक हो जाता है
आकार लेता सुंदर स्वप्न।
- रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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