तुम्हारा मिलना एक आकस्मिक घटना थी
tumhara milna ek akasmik ghatna thi
मैं मिली थी तुम्हें
विषाद भरा हृदय था मेरा
सूखी-सी बेल थी जीवन की
जिसपर पुष्प खिलने का मौसम
कभी आया ही नहीं
मैं मिली थी तुम्हें
जीवन की पगडंडी के डोलते रास्तों में
स्वयं ही भटकते हुए
घुमावदार बरगद की लटकती टहनियों में
उलझते हुए सुलझते हुए
आगे बढ़ने को डगमगाते हुए
मैं मिली थी तुम्हें
जब चाँदनी चेहरे पर थी
और जीवन अस्त हुए सूर्य के ग्रहण की छाया-सा
निस्तेज हो चला था
जब पक्षी अपने घर को लौट चले थे
मैं मिली थी तुम्हें
जब जीवन की ललक ज़िंदा थी मचलती हुई
जैसे मछली ज़िंदा रहती है
कुछ पल तड़पते हुए,
कुछ देर जीवन और प्राण के लिए
बिना जल के
तुम मिले तो जैसे
फूलों के खिलने का मौसम आ गया
तुम मिले जैसे
जीवन को रास्ता मिल गया
तुम मिले तो जैसे
अरुणिमा छा गई
और तुम मिले तो जैसे
सपने मछलियाँ बन मेरे मन में हिलोरे भरने लगे॥
- रचनाकार : ममता धवन
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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