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तुम सेब मत खाना

tum seb mat khana

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

तुम सेब मत खाना

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    इसकी बातों में आया करो तुम

    कुछ भी बकती है यह दुनिया तो

    बस अपने मन मुताबिक कहावतें गढ़ती है

    अगर प्रेम में देह ज़रूरी नहीं

    तो क्यूँ लगाए रहते हैं भीड़ मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों में?

    ये इनकी इक लंबी साज़िश है हमें दूर रखने की

    इतनी लंबी कि इसके एक छोर पर अछूते की गठान है

    तो दूसरे पर अलौकिक देवत्व की पतंग

    मत खाना इनके सेब

    छूने दो मुझे तुम्हें

    मेरी तर्जनी के प्लेटोनिक पोर को

    अपनी तर्जनी को सहलाते हुए अनामिका तक जाने दो

    और हो जाने दो मुझे विकृत साबित इस स्पर्श से

    मुझे सौंप दो मेरा प्रेम तुम

    मेरा दैहिक-प्लेटोनिक प्रेम!

    तुम गठान हो पतंग मेरे लिए

    नाचती हुई देवदासी

    मत पूछो क्या हो, मैं भी नहीं जानता

    तुम बस ये देखो कि आज इंद्रधनुष में छः ही रंग हैं

    भँवरे केंचुली छोड़ रहे हैं

    नदियाँ बरस रही हैं बादलों पर बहुत तेज़

    और पता नहीं क्यूँ आज बगुलों का झुँड पहले से बहुत बड़ा है

    पर बगुले नहीं हैं उसमें

    बस सियार उड़ रहे हैं गुलाबी

    वे बहुत ख़ूबसूरत लग रहे हैं

    पर उनके रंग पर मत जाना

    वे धीरे-धीरे रंग छोड़ते हैं

    उनके सेब मत खाना!

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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