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तुम महकते हो मेरी किताबों में

tum mahakte ho meri kitabon mein

ममता धवन

ममता धवन

तुम महकते हो मेरी किताबों में

ममता धवन

और अधिकममता धवन

    वो फूल मेरी किताबों में

    शुष्क और नीरस हैं

    जो फूल तुम्हारे संग

    रंगीन और ख़ुशबूदार थे

    वो फूल अब मेरी ज़िंदगी के बुकमार्क बन चुके हैं

    कभी किसी अध्याय पर टेसू का फूल रुका है

    तो किसी अध्याय पर चंपा का

    रजनीगंधा महकती है तुम्हारी यादों से

    और सूरजमुखी खिलता है अब भी

    तुम्हारे चेहरे को याद करके

    रात की रानी ने अतीत की स्मृतियों पर क़ब्ज़ा कर रखा है

    और गेंदे के फूलों की

    बंदनवार मैंने अब भी

    अपने दिल की चौखट पर सजा रखी है

    प्रेम के प्रस्फुटन की प्रतीक्षा में

    गुलाब आज भी

    फरवरी और दिसंबर की राह तकता है

    अपराजिता के बैंगनी फूल

    अब भी तुम्हारे मेरे अट्टहास की प्रतिध्वनि बने बैठे हैं

    मैं समझ नहीं पाती

    इन फूलों ने इतनी गहरी जड़ कब कैसे पकड़ ली?

    मैं समझ नहीं पाती

    किताबों में रखे ये फूल

    निर्जीव हैं

    या धड़क रहा है

    इनमें वो प्रेम अब भी?

    ये फूल

    तुम्हारी हथेलियों के स्पर्श का आभास अब भी देते हैं

    मेरी पढ़ने की आदत में

    इन फूलों ने ख़ासा दख़ल मचा रखा है॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : ममता धवन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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