तुम बार-बार करते रहे प्रयत्न
tum baar baar karte rahe prayatn
तुम बार-बार करते रहे प्रयत्न
मुझे लिखने का और
मैं हर बार मिटती गई
क्योंकि
तुम्हारे सारे प्रयत्न उतने ही कमजोर थे
जितना कमजोर था
तुम्हारा प्रेम।
तुमने कई बार मुझे लिखा
अरावली की पहाड़ियों से गिरते उन झरनों के पानी से
जो सावन के बाद तरसा देते हैं
एक बूँद पानी को भी।
फिर कभी तुमने रच दिया मुझे
जैसलमेर के
उन धोरों के बीच
जो तेज़ हवा के साथ ही बदल लेते हैं
अपना स्थान।
तुम्हारे इन असफल प्रयासों को देखकर
दम तोड़ती रही
तुम्हारी प्रेमिल भावनाएँ किसी अंतःवाहिनी घघ्घर की तरह।
और
जब तुम नहीं रच पाए मुझे
तो मैंने प्रवाहित करदी
राशमी के मातृकुंडिया में तुम्हारे मृत प्रेम की अस्थियाँ।
और मैंने
स्वयं चयन किया अपने
रचनाकार का।
जिसके लेखन में उतना ही स्थायित्व है
और प्रेम उतना ही पवित्र
जितनी स्थायी और पवित्र है
गंगा!
- रचनाकार : अनामिका अनुगूँज
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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