तुम ख़ूबसूरत हो एक आज़ाद वतन के मानिंद
मैं थका हुआ कमज़ोर किसी उपनिवेश की तरह
तुम उदास हो एक त्यक्त इंसान की तरह, लड़ते हुए
मैं एक निकट आते युद्द की तरह संभ्रांत हूँ
तुम किसी छापे के हासिल की तरह वांछित हो
मैं भयाक्रांत हूँ जैसे मलबों के ढेर में कुछ खोज रहा हूँ
तुम एक प्रशिक्षु पायलट की तरह निडर हो
मैं ठीक उतना ही गौरवांवित हूँ जितना उसकी दादी हों
तुम किसी मरीज़ के पिता की तरह चिंतित हो
मैं किसी नर्स की तरह बिल्कुल शांत हूँ
तुम उतनी ही मीठी हो जितनी ओस होती है
और मुझे उगने के लिए तुम्हारी ज़रूरत है…
हम दोनों किसी प्रतिशोध की तरह उद्दंड है
हम दोनों किसी क्षमा की तरह विनम्र हैं
तुम किसी न्यायालय की नींव की तरह मज़बूत हो
मैं बेसुध पड़ा हूँ जैसे किसी पक्षपात का शिकार हूँ
और हम जब भी मिलते हैं
हम बातें करते हैं, बिना रुके
जैसे दो परतें दुनिया को बचाए हुए हों
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : मुरीद बरघूती
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