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टुकड़ी-टुकड़ीमे बँटल मोन

tukDi tukDime bantal mon

बिभा विमर्श

बिभा विमर्श

टुकड़ी-टुकड़ीमे बँटल मोन

बिभा विमर्श

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    (1)

    बीतैत समयक संग

    बीति जाइत अछि मनुक्ख

    जेना कि तिल-तिल

    बीति रहल छी हमहूँ सभ

    मुदा जखन

    उनटि तकैत छी

    तखन मोन पड़ैत अछि

    बहुत रास नीक-बेजाय

    बीतल बहुत रास राग-उपराग

    से, एक आँजुर

    प्रीतिक आस करब

    कोनो अनुचित तँ नहि छल

    मुदा ओह

    खगता-बेगरताक धुनमे

    छुटैत चलल गेल सभटा

    बहुत किछु अहाँ बिसरलहुँ, तँ

    किछु-किछु छुटैत गेल हमरो हाथसँ

    (2)

    बान्हल नहि छी कोनो खुट्टासँ

    नहि लागल अछि कोनो गरदानी

    तेँ आभास अछि जे मनुक्खे तँ छी हमहूँ

    साँस लेबाक सेहो

    नहि अछि कोनो सीमा

    शरीरमे बाँचल अछि प्राण

    बस, छातीक धुकधुकी

    मद्धिम भऽ गेल करैत अछि

    कखनो काल, कोनो क्षण-विशेषमे

    मुदा शेष अछि

    एखनहुँ हमरा-अहाँमे

    किछु-ने-किछु करबाक लालसा

    (3)

    हम आब

    मारि लेबऽ चाहैत छी इच्छा

    हम भऽ जाइ चाहैत छी आब

    मोह-माया, सभ किछुसँ अनासक्त

    मुदा हमरा एखनो

    नुकायल अछि एक आर छवि

    जकरा नहि बुझल छैक

    नीच-ऊँच, झूठ-साँच, किछुओ टा

    नहि मानैत अछि ओहेन किछु

    जे कतहु लिखल नहि गेलै—

    ने कोनो ग्रंथ, ने कोनो शास्त्र-पुराणमे

    बस क्यो-क्यो आब

    किछु-किछु विचार अपन

    थोपैत जाइत गेलथिन,

    जकरा बँटैत गेलथिन स्त्री-पुरुषक नामे

    (4)

    से कहियो

    देने छलहुँ अहाँ हमरा

    मुखौटीये किछु अधिकार

    जाहिमे नहि छल कोनो बन्धन

    आकि नहि छलै कोनो रोक-टोक

    ओना सभ लिखित रहितै

    तखन होइतै मान्य, जकरा

    देखाकऽ मोन पाड़ि दितहुँ आइयो अहाँकेँ

    हे प्रभो

    लिखलाहा तँ होइत छै साक्ष्य

    मुँहक बाजल तँ मुकरि जाइत अछि लोक

    जेना कि अहूँ मुकरि गेलहुँ

    अपन कयल सभ टा प्रॉमिस

    खायल अपन सभ टा किरिया-सप्पत!...

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 65)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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