Font by Mehr Nastaliq Web

तुकांत तथा कुछ और तुकांत

tukant tatha kuch aur tukant

राजकुमार

राजकुमार

तुकांत तथा कुछ और तुकांत

राजकुमार

और अधिकराजकुमार

    एक

    कई वाक्य हैं जो अधूरे छूट जाते हैं

    पूरे होने की टेर नहीं करते...

    उम्मीद का माथा ठनक जाता है

    बि ल कु ल इस तरह जैसे हम

    कविता लिखने में देर नहीं करते।

    दो

    बहुत समय बीत गया कविता के बहाने,

    और एक उम्र के बाद यादें लगी सताने।

    क्या-क्या किया जाए अब तुम्हारे हवाले,

    कितने दिन गुज़र गए वे मुलाक़ात वाले।

    की-पैड पर टाइप कविता है दोलम-दोल,

    स्वांतःसुखाय कविता का अपना है मोल।

    कितना निष्ठुर प्रेम, पीड़ा ही बनी ढिठाई,

    और अतिरंजित कविता अनमोल मिठाई।

    है कौन-सा पर्व और कौन-सी छवि बनाई

    बतफ़रोश दिल की सुनने कहानी बन आई।

    तीन

    यातना के अँधियारे में जली कोई दीपशिखा

    ज़िंदगी की दहलीज़ से देख औ’ क्या दिखा,

    जल गए यादों के चिराग़ तो नम हुईं आँखें

    दुनियादारी की दीद ने दिया क्या-क्या सिखा,

    किस बात का ग़म करें क्यों बिगाड़ें हाल

    अरे यार ये ज़ायक़ा बन पड़ा इतना तीखा,

    खारे समन्दर में कहीं मीठे पानी सोता है

    एक बुलबुल जी उठी ज्यों बरसात रोता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : राजकुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY