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तुझको क्या कह के पुकारेंगे

tujhko kya kah ke pukarenge

गौरव त्रिपाठी

गौरव त्रिपाठी

तुझको क्या कह के पुकारेंगे

गौरव त्रिपाठी

और अधिकगौरव त्रिपाठी

    तुझको क्या कह के पुकारेंगे ज़माने वाले

    अपने होटों से मेरी जान बचाने वाले

    आज मुमकिन है तुझे आँख का तारा कर दें

    तेरे आँचल में कोई ख़ूब नज़ारा भर दें

    कल मगर एक हक़ीक़त तुझे सताएगी

    बात होटों से अगर दिल में उतर जाएगी

    तेरे कई नाम धरेंगे तेरे चाहने वाले

    तुझको क्या कह के पुकारेंगे ज़माने वाले

    तुझपे फिर एक फ़साना-सा बुना जाएगा

    हर गली में तेरे क़िस्सों को सुना जाएगा

    कई नग़्मे तेरी आँखों पे लिखे जाएँगे

    सांझ के रंग से सूरत तेरी सजाएँगे

    तुझको पूजेंगे तुझे मार के जाने वाले

    तुझको क्या कह के पुकारेंगे ज़माने वाले

    लोग डरते हैं सनम दिल की सुनने वालों से

    आशिकों, मस्त-फ़कीरों, ख़राब हालों से

    इनको डर है कोई आशिक़ कभी भी कर के

    डर मिटा दें ज़माने का मुस्कुरा कर के

    फिर कहाँ जाएँगे ये ख़ौफ़ दिलाने वाले

    तुझको क्या कह के पुकारेंगे ज़माने वाले

    इश्क़ आज़ाद ख़्यालों की फ़सल है जानम

    ज़िंदा लोगों की हर इक आह का फल है जानम

    इसमें तनक़ीद भी है और रज़ामंदी भी

    इश्क़ होने से ही हर ज़ुल्म सहल है जानम

    आशिक़ी की तो कोई और इमारत ही नहीं

    तेरी बाहें ही मेरा ताजमहल हैं जानम

    इश्क़वालों का किसी नस्ल से कोइ बैर नहीं

    सबमें दिखती हमें अल्लाह की शक्ल है जानम

    फिर हमे क्यों सताएँ ये सताने वाले

    चाक़ सीनों पे हसीं तख़्त सजाने वाले

    तुझको क्या कह के पुकारेंगे ज़माने वाले

    स्रोत :
    • रचनाकार : गौरव त्रिपाठी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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