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ट्रेन में एक मुलाक़ात…

tren mein ek mulaqat…

योगेंद्र पांडेय

योगेंद्र पांडेय

ट्रेन में एक मुलाक़ात…

योगेंद्र पांडेय

और अधिकयोगेंद्र पांडेय

    कभी-कभी कितना यादगार हो जाता है

    ट्रेन में सफ़र करना, जब

    कोई वर्षों पुराना चेहरा दिख जाता है,

    जिसे कभी प्रेम करते हों आप।

    और मन में उठने लगता है

    पुरानी स्मृतियों का धुआँ,

    एक अप्रत्याशित आकर्षण

    और ढेर सारे प्रश्न।

    आज कितने दिनों बाद तुम्हें देखा है,

    यूँ ऐसे ही एक सफ़र में,

    कि यादों का एक सघन धुंध

    उठ रहा है अंतस में।

    वो स्कूल के दिन, जब

    मेरी आँखों को रहता था इंतज़ार

    तुम्हें जी-भर देख लेने का,

    तुमसे ख़ूब बातें करने का—

    मगर आज क्यों तुम्हें देख मौन हूँ?

    मेरी डायरी का एक पन्ना भरा हुआ है

    तुम्हारे जन्मदिन वाली यादों की ख़ुशबू से,

    जब तुमने दिया था चॉकलेट मुझे,

    मुस्कुराते हुए।

    याद रहा है वो दिन,

    जब तुम गाया करती थीं गीत

    और मैं तुम्हें सुनने का

    ढूँढ़ता रहता था बहाना।

    क्या तुम अब भी गाती हो गीत?

    अब भी तुम्हें पसंद है कविताएँ लिखना?

    क्या अब भी हँसती हो खिलखिलाकर?

    क्या अब भी सपना देखती हो

    आसमान में उन्मुक्त उड़ने का?

    जाने कितने प्रश्न उठ रहे हैं मन में,

    आज बहुत दिनों बाद तुमको देखकर,

    ट्रेन के इस यादगार सफ़र में।

    फिर कब मिलना होगा—नहीं पता,

    मगर उम्मीद है, मिलेंगे ज़रूर

    ज़िंदगी के इस अंतहीन सफ़र में,

    बस यूँ ही चलते-चलते॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : योगेंद्र पांडेय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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