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तमाम नैतिकता चैतन्य की छाया है

tamam naitikta chaitanya ki chhaya hai

सुमन शेखर

सुमन शेखर

तमाम नैतिकता चैतन्य की छाया है

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    भाव और आधार शब्द के कोप से जल रहा है

    शब्द भूल चुका है अपनी गरिमा

    शब्द भूल चुका है आत्मा के क्षरण की सीमा

    पास बैठे, दूर बैठे

    हर तरफ़ से उठती है जलते शब्दों की लपट ही लपट

    शब्दों का जंगल जितना जलता है,

    उतना ही बढ़ता भी जाता है

    शब्द के पैरों तले लहूलुहान आत्मा रौंदा जाता है

    हासिल कुछ भी नहीं

    अपनी चोट को कम करने के लिए फेंका गया तीखा शब्द

    वापस और तीखे धार के साथ गिरता है

    युद्ध चलता रहता है किसी बड़े हानि के गिरने तक

    हर शब्द के पीठ पर जंगल है

    यातना, पीड़ा और हताशा का जंगल

    जंगल उगा है दोनों की ही आत्मा पर

    हर शब्द दोनों की ही आत्मा को पैना

    और पैना, चोटील करता जाता है

    धीरे-धीरे लहू से सनी आत्मा

    उस वन में फंस कर लिथरने लगती है

    तमाम नैतिकता चैतन्य की छाया है

    शब्दों की गरिमा

    कह कह पाने वालों से सीखनी चाहिए

    एक पागल बाबा ने कहा था—

    धर्म और पूजा पाठ निजी घटना है

    और कर्तव्य बहुत ही बेढंगा-सा शब्द

    किसी से प्रेम करना और निभाना अगर कर्तव्य है

    तो सिवाय दुख, रोष, हानिबोध के हासिल कुछ भी नहीं

    प्रेम पाने-देने की लालसा में

    प्रेम, करुणा और उल्लास ही छूटता है सबसे पहले

    कर्तव्य व्यक्तिगत भावनाओं के ज़ाहिर का क्षरण है

    हँसना और जीना भी कर्तव्य है क्या!

    ईश्वर महा दैत्य है

    दैत्य से लड़ने के लिए दैत्य की ज़रूरत नहीं बंधु

    बातों का आधार सटीक और मौलिक हो

    तो सारी लड़ाई शोषण तक टिकती है बराबरी से

    कहना पड़ेगा कि शोषण के भी मत भिन्न हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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