अपनी जगह अच्छी तरह साफ़ करने के बाद
वह अपनी कारीगरी के साज़ो-सामान रखता है
पॉलिश, ब्रश, रंग, सुआ और मोटा धागा
कहता है मोची नहीं, कारीगर हूँ
मैं दुनिया का कृत्रिम तलवा सीता हूँ
जान लीजिए साहेब
जूता जब चमकता है
आदमी आत्मविश्वास से भर जाता है
मेरी अहमियत उनसे भी पूछिए
जिनके चप्पल बीच रास्ते में टूट जाते हैं
जब चल ही रहा था ये संभाषण
एक ब्याहता अपना पैर घिसटते हुए आती है
दस रुपए लगेंगे, कहता है कारीगर
इतने पैसे एक पैबंद के?
अब दस से कम की एक चाय भी नहीं आती
मेरे हुनर की न्यूनतम क़ीमत यही है
बोनी तो इससे बहुत ऊपर की करता हूँ
कोई स्टूडेंट होता तो कम में कर देता
या मुफ़्त में भी कर देता
पिछले 30 सालों से लोगों के पैरों को देख रहा हूँ
पर शायद ही कोई हमारा चेहरा देखता होगा
तलवे ज़रूर सीते हैं साहेब
लेकिन उसके नीचे रहते नहीं हैं।
- रचनाकार : संतोष सिंह
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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