Font by Mehr Nastaliq Web

टाइफ़स के मारे

taiphas ke mare

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

यूरे काष्तेलान

यूरे काष्तेलान

टाइफ़स के मारे

यूरे काष्तेलान

और अधिकयूरे काष्तेलान

    एक :

    गिन रहा पदचिह्न मैं श्वेत हिम पर। मृत्यु पर मृत्यु।

    मृत्यु ही पदचिह्न मेरे।

    मृत्यु पर मृत्यु। मृत्यु पर मृत्यु

    मृत्यु ही पदचिह्न मेरे।

    जा रहा

    प्रत्येक

    अपनी

    क़ब्र को।

    जा रहा प्रत्येक अपनी क़ब्र को।

    ज्यों स्रोत

    अपने सागर को।

    जा रहा प्रत्येक अपनी कब्र को।

    दो :

    क्या इस राह से गुज़रेगा कभी

    विस्तृत आकाश, सुभागिनी दृष्टि?

    क्या प्रस्फुटित होंगे जल-स्रोत और बाँसुरियाँ

    और चहचहाएँगी क्या सुबहें वसंत की?

    क्या पदचिह्न भूमि पर ही रहेंगे

    और दबे ही रक्त से लोहा लेंगे?

    अथवा हिमपात अँधेरी शांति में

    शब्दों को, चिह्नों को, राहों को मिटा देंगे?

    तीन :

    बर्फ़ीला तूफ़ान, वायु का वेग

    मनुष्य कहीं वृक है।

    —आग, आग—

    हड्डियाँ चीख़ती हैं।

    —तारे, तारे—

    आँखें खोजती हैं।

    काली दाढ़े चाव लेंगी

    मेरी उँगलियों को, मस्तक को...

    बर्फ़ीला तूफ़ान, वायु का वेग

    मनुष्य कहीं वृक है :

    —बंधुओ प्रिय, भाइयो, लोगो

    नीरवता में

    बहरे पग

    थके-माँदे।

    सुनता हूँ शब्द

    ज्वर में

    —कामरेड...

    —कामरेड...

    हाथ में ठंडा हाथ थामता हूँ।

    चलता जाता हूँ

    मूक

    सैन्य टुकड़ी में।

    चार :

    मत बोलो रजनी

    नीरवता बिना छायाभास

    मूकता से

    निःशब्द

    मेरे अंतर में

    मृतक बुदबुदाया

    त्सेतिना मेरे समतल देहात

    तू सम कहाँ तेरा जब तल जल में

    मत बोलो रजनी

    यह माँ अपने हाथ

    मेरे स्वप्नों पर

    अपने बेटे पर

    फेर रही है

    और उसके श्यामल

    श्यामल

    केश

    स्वप्न-से

    मेरे भाल पर

    उग रहे हैं।

    मत बोलो रजनी

    पर्वत के परे

    मृत्यु

    पिशाचिनी के अस्त्र

    और पाशविक धोंकनी के कोटर

    नथुने फूल रहे हैं :

    लपटें

    और फाँसी

    वमन कर रहे हैं।

    त्सेतिना मेरे समतल देहात...

    मत बोलो रजनी

    और बिना प्रातःकाल

    और बिना पंखों के

    अंतिम शब्द एक और

    और अंतिम शुभकामना

    मृत्यु

    मेरे लिए

    छोड़ गई।

    पाँच :

    किधर से ये दिन, हथेली पर दहकता कपोत,

    किधर से ये स्वर, किस किनारे से उठा

    सकल ऊषालोक से? सुन रजनी जब धधकें वन में लपटें।

    किधर से ये स्वर, कौन किनारे उठा?

    हर पदचिह्न पर हर पग पर : मुक्ति, मुक्ति,

    मुक्ति घावों से, पनप रही मुक्ति रक्त से।

    हर पदचिह्न पर, हर पग पर मुक्ति, मुक्ति।

    जब गीत मर जाएँगे, तू जो स्वयं प्रेम है,

    जैसे राह में जंगली गुलाब, पंख फैलाए ज्यों।

    जब गीत मर जाएँगे, तू जो स्वयं प्रेम है

    क्या मरकर जीवित प्रेम देगी

    जो मृत्यु से लड़े और इस्पात को तोड़ दे?

    क्या मरकर जीवित प्रेम देगी

    जो हर हृदय में पुन: जन्म ले

    क्या तू ऊषा के स्वर से रात्रि में गाएगी?

    यदि गिर जाऊँ अँधेरे में, जीवितों तक शुभकामना पहुँचाना,

    क़ब्र से हृदय तक, ले जाना अँधेरों से

    गीत जो आहे भरें : मुक्ति, मुक्ति।

    छ:

    ज्वर बढ़ रहा है। हाथ में हाथ थामता हूँ।

    कामरेड के माथे से सटा मेरा माथा जल रहा है।

    जब उन्मत्त तपन में बुद्धि धुँधला जाती है

    प्रेम बदले की दृढ़तर भावना से बड़बड़ाता है।

    सैन्य टुकड़ी चल रही है। ज्वर में पैदा होते

    सूर्य से प्रकाशित घने वन।

    अंधकार में सुनता सजीव वार्तालाप,

    जीवित की आँखों से देखता नए दिन।

    देखता हूँ झील पारदर्शी और शांत,

    बचपन की मुड़ी हुई छड़ी नदी पर

    और नए शब्द कभी सुने,

    लोग पहचाने सुदूर छोर पर।

    सगी धरती, मैं तुझसे मिलने आया,

    वरन् कंबल में, जूओं से गुँथा, भरा घावों से,

    अशक्त, सिमटा हुआ, मुश्किल से उठाता क़दम—

    और इसीलिए तू मुझसे बढ़कर ढली है।

    हर चेहरे पर केवल आग जल रही है।

    भूख और आग प्यासे होट देते

    बूँद पानी की। तम आँखें मींचते,

    और जितने पास हम भोर के रात बढ़ती जा रही है।

    पग पर पग। मृत्यु फेंकती गड्ढे में

    मनुष्य को, घोड़े को। मेरे लिए भोर नहीं

    लेकिन हम मृत्यु में भी मुक्ति-सैनिक हैं

    और हमारे मृत और अधिक लड़ते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 110)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : यूरे काष्तेलान
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY